🚩यात्रा भगवान केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग की 🚩
साथियों नमस्कार 🙏
दोस्तों,मेरा एक पड़ोसी उसका नाम श्याम शर्मा उर्फ भाले भाई है। वह उम्र में मेरे से लगभग 10 वर्ष छोटा होगा। वह 29 मई 2014 को अपने एक साथी अंकुश को लेकर मेरे पास आया। और मेरे से बोला कि कटारिया जी अभी केदारनाथ चल रहे है। मैंने उस को समझाया, कि भाई कहीं भी जाने के लिए पहले से कुछ तैयारी करनी पड़ती है। और तुम रात को दस बजे आ कर बोल रहे हो, कि अभी केदारनाथ चलना है। भाई ऐसा नहीं होता पहले बताया होता तो तैयारी करते और फिर केदारनाथ धाम की यात्रा पर चलते।
उन्होंने अब मेरे से बड़ी बड़ी बाते करनी शुरू कर दी। और मेरे से बोले आप तो बहुत बड़े घुमक्कड़, हिम्मती, शेर दिल आदमी बनते हो, और अब चलने से डर रहे हो,... उनके द्वारा कही गई इस तरह की बातें मेरे से बर्दाश्त नहीं हुई। मैंने कहा कि चलो.... मैंने अपने बेटे से कहां मेरे दो जोड़ी कपड़े रख दो। छोटा बेटा काफी समझदार था, झट से उसने पाच मिनट में एक बैग में कपड़े रख कर मुझे दे दिए। मेरी पत्नी ने मुझ को काफी समझाया, भला इस तरीके से कहीं केदारनाथ जाते हैं। तुम भी इन की बातों में आकर इनके साथ चल दिए। फिर मैंने अपनी पत्नी को समझाया कोई बात नहीं, एक बार ऐसे ही सही। बस थोड़ी सी पत्नी वंदना की, पत्नी ने जाने की इजाजत देदी। हम तीनो आदमी दो बाइक से केदारनाथ की यात्रा के लिए घर से चल दिए।
भाले भाई के साथ दूसरा बंदा अंकुश शर्मा था। वह मेरे घर की पिछली गली में रहता था। हम उसके घर पहुंचे, वहां पहुंचकर उन्होंने मेरा पागल बना दिया, और प्रोग्राम कैंसिल कर दिया। और मुझ से कहने लगे, हम तो बस मज़ाक कर रहे थे। हम तो सिर्फ यह देखना चाह रहे थे, कि आप में हिम्मत है भी या नहीं। यह सुनकर मुझे उन पर बहुत गुस्सा आया, पर उन्हें कुछ नहीं कहा। बस खून का घूंट पीकर ही रह गया। बताओ यार क्या बदतमीजी है, ऐसे मजाक की भी हद होती है। और इस तरीके का मजाक शायद कोई भी व्यक्ति पसंद नहीं करेगा। बस खून का घूंट पीकर ही रह गए अब दिक्कत यह थी, कि घर कैसे पहुंचा जाए, बड़ी शर्मिंदगी हो रही थी।
मै वहां से अपना सा मुंह लेकर सीधा घर वापिस पहुंचा। घर वापिस आए तो, मैडम ने पूछा.. क्या हुआ, तुम तो केदारनाथ गए थे। फिर वापस क्यों आ गए, क्या बात हो गई। मेरे साथ घटी सारी घटना घर में सब फैमिली मेंबर्स को बताई, जो हमारे साथ घटित हुई थी। अब मैडम के उपदेश मेरे ऊपर शुरू हो गए थे, तुम्हे कोई काम धंधा तो नहीं है, कोई भी कभी भी आए ओर तुमसे कहे, तुम उनके साथ चल देते हो, आने दो उस भाले भाई को, उसे मैं बताऊंगी, कहीं ऐसे भी मजाक होता है। खेर हम बेवकूफ बन गए थे। गुस्सा तो मुझे भी बहुत आ रहा था, और हमने शांत रहने में ही अपनी भलाई समझी, ओर चुपचाप अपने बिस्तर पर जाकर लेट गए। गर्मी का मौसम था। अब सोते हुए हम यही सोच रहे थे कि जीवन में अब इनके साथ कभी भी कहीं नहीं जाना है, इस तरीके से तो ये लोग मुझे कहीं भी फसवा देंगे। अब इन पर कभी भी विश्वास नहीं करूंगा।
इस घटना को बीते हुए एक साल हो गया था। भाले भाई, फिर 30 मई 2015 को अचानक दोपहर तीन बजे एक बैग लेकर फिर मेरी फैक्टरी में आ गए। और बोले कटारिया जी अभी केदारनाथ चलना है। पिछले साल तो मैं जा नहीं पाया था। मैंने कहा, क्यों पागल बना रहे हो, एक बार तो तुम मेरा पागल बना ही चुके हो। अब मैं तुम्हारी बातों में नहीं आने वाला हूं। लेकिन वो जिद कर रहा था कि अभी चल रहे है। लेकिन मुझे उस पर यकीन नहीं था कि यह केदारनाथ जाएं गा। भोले भाई मेरे से काफी जिद करने लगा कि भाई सच में ही केदारनाथ जा रहे हैं, एक बार फिर मै अपने घर आया। मेरा घर और फैक्ट्री आमने सामने ही है।
घर आकर मै पत्नी से बोला कि मै अभी केदारनाथ जा रहा हूं। पत्नी जी बोली, पिछले साल तो इन्होंने झूठ बोला ही था। और तुम्हारा पागल बनाया ही था, तुम फिर इनकी बातो में आ गए। थोड़ी देर तक फिर पत्नी वंदना की, ओर पत्नी देवी मान गई। लेकिन साथ ही पत्नी ने हमें कड़ी हिदायत दी, अगर इस बार फिर वापिस आ गए तो शाम को खाना नहीं मिलेगा। मैंने कहा, चलो ठीक है। तुम मेरे कपड़े रख दो। पत्नी ने दो जोड़ी कपड़े व एक चादर रख दी। लेकिन पत्नी ने फिर मेरे से कहा, मैं तुम्हें फिर समझा रही हूं, कि ये फिर से झूठ बोल रहा हैं।मुझे इस भले भाई पर बिल्कुल भी यकीन नहीं है। इस लिए मै गर्म कपड़े नहीं रख रही हूं, क्यों की गर्म कपड़े बड़े संदूक में रखे हुए है। पत्नी एक बार फिर से कहां, इसे जाना वाना तो है नहीं, और संदूक खोल कर काम और फेलेगा। मैंने कहा ठीक है, क्योंकि कुछ आभास मुझे भी था कि शायद यह पिछली बार की तरह इस बार भी ना न कर दे। इसलिए मुझे भी उम्मीद कम ही लग रही थी कि भाले भाई केदारनाथ जाएगा।
भाले भाई, मेरे पड़ोसी अभिषेक यादव से, जो उनके भी मित्र थे। उनकी बिल्कुल नई i smart बाइक मांग के ले आए। अभिषेक यादव की दो महीने पहले ही शादी हुई थी, और यह बाइक उन्हें शादी में मिली थी। हम दोनों उस बाइक पर सवार होकर दिल्ली से हरिद्वार की ओर चल दिए। मुझे व मेरे परिवार को अब भी उम्मीद नहीं थी कि भाले भाई केदार नाथ जाएगा। कारण पिछले साल इन्होंने मेरा पागल बनाया ही था दूसरा कारण बाइक भी दोस्त की मांगी गई थी।
अभी दोपहर के 3:45 ही बजे थे यहां से बाइक मैंने ही संभाली। हम दोनों बाइक पर हरिद्वार की ओर चल दिए। अब हम दोनों बाइक पर बातें करते हुए जा रहे थे और मैंने भाले भाई को हिदायत दे दी थी कि अगर अब कुछ भी झूठ बोला तो तुझे बाइक से नीचे उतार कर खुद ही केदारनाथ चला जाऊंगा। लेकिन उसने मुझे आश्वासन दिया कि हम केदारनाथ ही चल रहे हैं। हम दोनों सारे रास्ते बात करते हुए चले जा रहे थे पता ही नहीं चला कि हरिद्वार आ गया। रात्रि 8:30 पर हमने हरिद्वार स्थित हर की पौड़ी पुलिस चौकी पर बाइक पार्किंग में लगा दी। सबसे पहले हमने रात्रि में ही हर की पौड़ी पर गंगा स्नान किया। गंगाजल में स्नान करने के बाद हमारी सारी थकावट दूर हो गई थी। गंगा जी का जल गर्मी के मौसम में भी काफी ठंडा था। स्नान करने के बाद पास ही स्थित मोहन पूड़ी वाले के यहां पूडी सब्ज़ी, व एक एक गिलास ठंडी लस्सी खा पीकर भूख को शांत किया। अब शरीर में नई चेतना व ताज़गी आ गई थी।
जब हम खाना खा रहे थे तभी घर से पत्नी का फोन आया। और पूछा कि कहां पर हो। मैंने कहा कि हम हरिद्वार पहुंच गए है। पत्नी बोली मैंने गर्म कपड़े तो रखे ही नहीं, मे तो सोच रही थी कि ये भाले फिर से मज़ाक कर रहा है। मैंने पत्नी से कहा कुछ बात नहीं, मै शेर आदमी हूं। यहां कोई ज्यादा ठंड भी नहीं है। मैंने अपनी पत्नी का ढांढस बढ़ाया, कि जो होगा देखा जाएगा घबराने की कोई बात नहीं है। यहां पत्नी को सच में अपनी गलती का बहुत एहसास हुआ कि मुझे मज़ाक नहीं समझना चाहिए था। लेकिन पत्नी को मेरी हिम्मत व मुझ पर पूरा विश्वास था।
हर की पौड़ी से हम रात्रि 9:45 पर ऋषिकेश की ओर चल दिए। ऋषिकेश में भाले भाई के ताऊ जी का एक घर है। भाले भाई के ताऊ जी व उनका परिवार मेरे घर के बिल्कुल पीछे मौजपुर दिल्ली में ही रहता है। परन्तु गर्मियों की छुट्टियों में उनका परिवार ऋषिकेश में कुछ दिन के लिए आ जाता है। हम ताऊ जी के यहां पहुंचे, इस समय रात्रि के 10:15 बज चुके थे। ताऊजी को कई आवाज दी लेकिन दरवाजा नहीं खुला भाले भाई दीवार कूदकर घर में घुस गए देखा तो सब सोए पड़े थे। वह हमें अचानक देखकर एकदम चौक गए और कहने लगे कि भाई सब ठीक-ठाक तो है। आने से पहले कोई तुमने खबर भी नहीं दी, मैंने उनको सारी बात बताई, फिर उन्होंने खाने के लिए पूछा उन्हें हमने बताया कि खाना हम खा पीकर आए हैं भाले भाई की भाभी ने चाय नाश्ता तेयार कर दिया। चाय पानी पी कर कुछ समय तक हम आपस में बात करते रहे। फिर अपनी अपनी चारपाई पर लेट गए, हमें नींद नहीं आ रही थी क्योंकि हमें सुबह जल्दी उठकर चलना था।
सुबह 4:30 बजे मेरी आंख अपने आप ही खुल गई। मैंने भोले भाई को जगाया, ओर हम पाच बजे चलने की तैयारी शुरू कर दी। यहां से फिर मैंने बाइक उठाई। और ऋषिकेश से केदारनाथ के लिए चल दिए। ऋषिकेश मेन मार्केट स्थित पेट्रोल पंप पर बाइक के पेट्रोल टैंक को फुल कराया और केदारनाथ जी की यात्रा पर चल दिए। सुबह का समय था सड़क एकदम खाली थी, गर्मी के मौसम में भी यहां से ठंड का एहसास होने लगा था दोनों ने सिंगल आधी बाजू की टीशर्ट ही पहनी हुई थी व पेंट पजामें की जगह निक्कर पहना हुआ था। हम सुबह सात बजे देवप्रयाग पहुंच गए। ऋषिकेश से देवप्रयाग की दूरी लगभग 70 किलोमीटर है, जो आमतौर पर दो या 2:15 घंटे में तय हो जाती है। रास्ते में बस शिवपुरी ही पड़ता है बाकी और कोई बाजार इनके मध्य नहीं पड़ता है।
देवप्रयाग बस स्टैंड के पहले से ऊपर सड़क से हमने भागीरथी व अलकनंदा नदी के संगम के दर्शन किए। देवप्रयाग संगम का नज़ारा यहां से बहुत ही शानदार दिखाई दे रहा था। देवप्रयाग एक बहुत ही सुंदर व रमणीय स्थल है। वास्तव में देवप्रयाग संगम को देख कर आत्मा प्रसन्न हो गई। यहां पर एक चाय की दुकान पर हमने अपनी बाइक रोकी और यहां पर चाय समोसे का नाश्ता किया। नाश्ता करने के बाद हम आगे की यात्रा के लिए चल दिए।
देवप्रयाग से से चलकर हम श्रीनगर की ओर चल दिए देवप्रयाग से श्रीनगर की दूरी लगभग 38 किलोमीटर है, सुबह का समय था, हमारी बाइक सड़क का सीना चीरती हुई आगे बढ़ती जा रही थी। लगभग सवा घंटे में हम श्रीनगर स्थित अलकनंदा नदी ब्रिज पर पहुंच गए। यहां पर हमने 10 मिनिट अलकनंदा नदी के तट पर बैठ कर प्राकृतिक सौंदर्य का लुफ्त उठाया, ओर यहां से रुदप्रयाग के लिए चल दिए। श्रीनगर और रुद्रप्रयाग के बीच रास्ते में धारी देवी माता का मंदिर आता है। धारी देवी मंदिर जाने के लिए रोड से नीचे नदी के ऊपर स्थित मंदिर में जाना होता है। ऊपर रोड से यह पैदल दूरी लगभग 300 मीटर के करीब पड़ती है हमने ऊपर रोड से ही माता धारी देवी को नमन किया।
मैं आपको बता दूं कि धारी देवी मंदिर के चारों और प्राकृतिक सुंदरता कूट-कूट कर भरी हुई है। धारी देवी मां का मंदिर उत्तराखंड की प्रमुख देवी के रूप में माना जाता है। धारी देवी मंदिर से रुद्रप्रयाग की दूरी लगभग 18 किलोमीटर होगी।
धारी देवी मंदिर से लगभग आधे घंटे में हम रुद्रप्रयाग स्थिति प्रमुख तिराहे पर पहुंचे। इस तिराहे से उल्टे हाथ की ओर एक रास्ता केदारनाथ की ओर मुड़ जाता है। व सीधे का रास्ता श्री बद्रीनाथ जी की ओर चला जाता है। यहां से उल्टे हाथ की ओर मुड़ते ही अलकनंदा और मंदाकिनी के संगम के पास ही काली कमली धर्मशाला के बिल्कुल सामने ही पहाड़ों के बीच बनी सुरंग को पार करते ही श्री केदारनाथ का रास्ता शुरू हो जाता है। रुद्रप्रयाग स्थित संगम से सोनप्रयाग की दूरी 75 किलोमीटर रह जाती है।
रुद्र प्रयाग से केदारनाथ का रास्ता थोड़ा सकरा हो जाता है रुद्रप्रयाग से अगस्त मुनि की दूरी लगभग 20 किलोमीटर है। 2013 में यहां आई त्रासदी के बाद यहां की रोड प्रशासन द्वारा अच्छी बना दी गई थी। अब रुद्रप्रयाग से आगे चलते के साथ ही हमें केदारनाथ त्रासदी के नुकसान अब हमे जगह-जगह दिखाई देने लगे थे। अगस्त मुनि से ही 2013 में आई प्रलय के दर्शन दिखाई देने लगे, यहां पर काफी घरों को नुक़सान पहुंचा था, यहां पर टूटे हुए घरों का कुछ हिस्सा अभी भी पहाड़ो पर लटका हुआ था, पुराना रास्ता तो पानी में बह कर नदी में चला गया था अब यहां नया रास्ता बनाया जा रहा था। लटके हुए घरों को देख कर डर लग रहा था कि कहीं ये अभी गिर न जाए इस स्थान को देखकर हमने जल्दी निकलने में ही अपनी भलाई समझी।
अगस्त मुनि को पार कर एक उपयुक्त स्थान पर हमने जहां पर सड़क निर्माण चल रहा था। जिसका रास्ता नदी के बिल्कुल बराबर से जा रहा था हमने वही पर बाइक रोककर मंदाकिनी नदी में स्नान किया। स्नान करने के बाद शरीर में एकदम नई ताजगी आ गई थी मंदाकिनी नदी का पानी बहुत ठंडा था। लेकिन हमें कहां ठंड लगती है, हम तो ठंडे पानी में नहाने के शौकीन है। दोस्तो अपनी सवारी से जाने का एक यही फायदा होता है जहां मर्जी रुको, जो मर्जी देखो,। प्राकृतिक सुंदरता का आनंद लो, जहां मर्जी खाओ जहां मर्जी पियो।
यहां स्नान करने के बाद हम गुप्तकाशी पहुंचे अगस्त मुनि से गुप्तकाशी की दूरी लगभग 26 किलोमीटर पड़ती है। लेकिन गुप्तकाशी से पहले ही इसी मेन रोड पर एक स्थान कुंडा आता है। कुंड गुप्तकाशी से 9 किलोमीटर पहले पड़ता है। कुंड से सीधे हाथ को जाने वाला यह रास्ता उखीमठ, चोपता तुंगनाथ होते हुए गोपेश्वर चमोली स्थित बद्रीनाथ वाले रास्ते पर मिल जाता है। यह रास्ता प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर व स्वर्ग समान है।
रुद्रप्रयाग के बाद गुप्तकाशी काफी बड़ा व सुसज्जित शहर दिखाई दिया, यहां पर चार धाम यात्रा का बायोमेट्रिक रजिस्ट्रेशन हो रहा था, लेकिन हमने यहां पर रजिस्ट्रेशन नहीं कराया क्योंकि यह रजिस्ट्रेशन हमें सोनप्रयाग करवाना था। इसलिए हमने यहां पर रुकना ठीक नहीं समझा। यहां से हम फिर आगे बढ़ते ही गए कोई 14 किलोमीटर चलने के बाद फाटा नामक स्थान आया। फाटा से केदारनाथ मंदिर तक हेलीकॉप्टर सेवा शुरू हो जाती है, कई प्राइवेट कंपनियां व पवन हंस हेलीकॉप्टर अपनी सेवाएं यहां से केदारनाथ जी के लिए देते हैं। 2015 में,फाटा से केदारनाथ आने जाने का किराया ₹ 7800 प्रति व्यक्ति था।
फाटा से अब हमें हल्की बूंदाबांदी का सामना करना पड़ा लेकिन बाबा केदार के दीवाने बिना रुके ही चलते गए, और सीतापुर होते हुए दोपहर 12:30 पर सोनप्रयाग पहुंचे गए। फाटा से सोनप्रयाग की दूरी लगभग 16 किलोमीटर है जो आसानी से आधे घंटे से पहले ही पूरी हो जाती है। क्योंकि उस समय सड़कों पर वाहन ना के बराबर ही थे प्रशासन द्वारा अच्छी सड़क का निर्माण कर दिया गया था। 2013 में आई त्रासदी के कारण यहां पर आने वाले यात्रियों की संख्या बहुत कम थी।
सुन्दर सोनप्रयाग छोटा सा बाजार
सोनप्रयाग में बैरियर लगाकर रास्ता बंद किया हुआ था यहां से आगे कोई भी व्यक्ति अपने वाहन से आगे नहीं जा सकता। सोनप्रयाग की खूबसूरती को देखकर में अपने को ठगा सा महसूस करने लगा। क्योंकि यहां पर चारों तरफ ऊंचे ऊंचे पहाड़ ओर सामने ही बहती हुई अलकनंदा नदी और सोनप्रयाग एक बहुत छोटा सा बाजार यहां की सुंदरता का शब्दों में वर्णन करना भी मुश्किल है।
सोनप्रयाग पहुंचकर सबसे पहले हमने केदारनाथ जाने की जानकारियां एकत्रित करनी शुरू कर दी हमें पता चला कि यहां पर यात्रा पर्ची व मेडिकल टेस्ट होगा लेकिन इस समय यात्रा पर्ची काउंटर व मेडिकल चेकअप दोनो बन्द हो गए थे। पता चला कि यहां पर पर्ची व मेडिकल चेकअप का कार्य प्रशासन द्वारा 3:00 बजे से शुरू होगा। अब हमारे पास काफी समय बचा था। पुलिस चेक पोस्ट के ठीक सामने ही चेक पोस्ट बैरियर पर ही हमने एक रेस्टोरेंट पर खाना खाया व उसी रेस्टोरेंट में पाच सौ रुपए में हमने एक कमरा लिया। तीन बजे से पहले ही बहुत से यात्री, यात्रा पर्ची बनवाने के लिए लाइन में लग गए थे। फिर हमने भी लाइन में लग कर अपना बायो रजिस्ट्रेशन व मेडीकल कराया। लगभग 1 घंटे में यह सारी प्रक्रिया पूरी हो गई थी।
सोनप्रयाग के ठंडे मौसम में, हमने घूमना शुरू कर दिया यहां का वातावरण काफी ठंडा था लेकिन गरम कपड़ा मेरे पास तो था ही नहीं। लेकिन मेरे मित्र भले भाई फुल तैयारी के साथ आए थे। यहां घूम फिर कर व ठंडे मौसम का हमने आनंद लिया। सोनप्रयाग में भी गजब की प्राकृतिक सौंदर्यता है। यहां पर भी मंदाकिनी व सोन नदी का संगम है। अब सोनप्रयाग से आगे प्राइवेट गाड़ियों का जाना मना है, जबकि पहले प्राइवेट गाड़ियां यहां से 5 किलोमीटर आगे गौरीकुंड तक जाया करती थी लेकिन अब प्रशासन ने प्राइवेट गाड़ियों के लिए अंतिम स्टेशन सोनप्रयाग ही बना दिया है। रात्रि के 7:30 बजे हमने डिनर किया। इसके अलावा मैंने यहां से 1 जोड़ी अतिरिक्त हवाई चप्पल और खरीद ली। क्योंकि मेरे जूते बिल्कुल नए थे। हमारे बराबर वाले कमरे में ही गुडगांव के चार बंदे हमें और मिल गए थे उनके साथ बैठकर हमने 9:30 बजे तक बातचीत की उसके बाद सब अपने कमरे में पहुंचकर रजाई में घुस कर लेट गए।
साथियों आज 1 जून की तारीख थी। 1 जून को भी मेरे पुत्र का जन्म दिन था, व 1 जून को ही मेरे पिताजी की पुण्यतिथि थी। सुबह मेरी आंख 3:00 बजे ही खुल गई थी मैंने जल्दी से ठंडे पानी में ही स्नान किया। जल्दी जल्दी तैयार होकर सुबह चार बजे हमने चेक पोस्ट पर पहुंचे जो हमारे होटल के बिल्कुल नीचे था। इस चेक पोस्ट पर हमने अपनी पर्ची व मेडिकल चेकउप पर्ची दिखाई उत्तराखंड पुलिस के जवानों ने पर्ची पर मोहर लगा कर बैरियर से अंदर जाने दिया। जैसे ही हमने बैरियर पार किया 200 मीटर चलने के बाद सोन नदी पर बने पुल को पार करते के साथ ही प्रशासन द्वारा नियंत्रित टाटा सूमो गाड़ी में ₹ २० प्रति सवारी किराया देकर गौरी कुंड पहुंचे।
प्रशासन द्वारा नियुक्त की गई गाड़ियां जो गौरीकुंड तक जाती है
गौरीकुंड यहां से पैदल यात्रा शुरू होती है
गौरीकुंड से ही केदारनाथ धाम की पैदल यात्रा शुरू हो जाती है जैसे ही हम गोरी कुंड के बाजार के बीच से निकले तो दिल दहलाने वाला दृश्य सामने आने लगे, टूटे हुए मकानों को देखकर बहुत डर लग रहा था जल्दी-जल्दी हमने बाजार को पार किया एक और चेक पोस्ट पर यात्रा परची दिखाकर आगे बढ़े। यहां से आगे का रास्ता बहुत अच्छा बना हुआ था। पैदल रास्ते में जगह जगह प्राकृतिक सौंदर्यता व दूर बहता झरना बरबस अपनी ओर आकर्षित कर रहा था। हर हर महादेव के जयकारे लगाते लगाते हम जंगल चट्टी, भीमबली को पार कर रामबाड़ा पहुंचे। काफी सर्दी हो गई थी फिर मैंने अपनी चादर निकाल ली गरम कपड़ा मेरे पास कोई नहीं था, चादर को ही लपेटकर मै आगे चलता रहा।
इस रास्ते में पहली बार हमें रामबाड़ा मंदाकिनी नदी के पुल से ठीक पहले ही हमें गिलेसियर के दर्शन हुए। 2013 में रामबाड़ा एक अच्छा खासा बाजार हुआ करता था और काफी मात्रा में होटल व रेस्टोरेंट यहां पर होते थे। पर अब यहां पर कुछ भी नहीं बचा केदारनाथ त्रासदी में सबसे ज्यादा नुकसान रामबाड़ा में ही हुआ था। 2013 में रामबाड़ा से ही केदारनाथ को उल्टे हाथ की ओर रास्ता सीधा ही जाता था। लेकिन अब यह रास्ता सब प्रलय में बह गया था। लेकिन अब प्रशासन ने मंदाकिनी नदी पर एक पुल बनाकर यहां से केदारनाथ के लिए एक नया रास्ता सीधे हाथ की ओर बना दिया है। रामबाड़ा में प्रलय आने के बाद यहां पर कुछ भी नहीं बचा, एक ईंट भी यहां पर नहीं बची थी, और प्रलय में सबसे जायदा नुक़सान भी यही हुआ था।
अब हमे यहां से मंदाकिनी नदी पार करनी थी। मंदाकिनी नदी पार करने के लिए एक ही टूटा हुआ पुल था, जो प्रशासन में 2014 में बनाया था। जिस पर अब चलना काफी मुश्किल काम था। इस पर एक एक आदमी को निकाला जा रहा था इस पुल पर चलने पर डर लग रहा था, जैसे तैसे हमने यह पुल पार किया, यहां पर इस समय आर्मी के बहुत से जवान एक नया पुल, इसी पुल के समानांतर तेयार कर रहे थे। और अगले दिन जब हम वापिस आए तो हमे नया पुल तेयार मिला था। वापसी में हमने नए पुल से ही मंदाकिनी नदी पार की थी। इस पुल के इतनी जल्दी निर्माण करने के लिए इंडियन आर्मी को सेल्यूट, वास्तव में, इंडियन आर्मी ज़िंदाबाद।
राम बाड़ा के बाद यहां से एकदम खड़ी चढ़ाई शुरू हो जाती है। और यह रास्ता भी टूटा फूटा था जबकि गौरीकुंड से रामबाड़ा का रास्ता एक दम बढ़िया जैसा वैष्णो देवी का था, उस प्रकार का था। अब यहां से आगे खड़ी चढ़ाई पर चलने में सांसे फूलने लगी थी। क्योंकि यहां से काफी ऊंची चढ़ाई शुरू हो जाती है। 3000 मीटर की ऊंचाई के बाद पेड़ पौधेब वनस्पति भी नहीं उगते हैं जिस कारण वातावरण में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है इसी कारण पैदल चलने में परेशानी होती है।
हम थोड़ा आगे ही बड़े थे कि एक जगह पर हमें एक दुकान दिखाई थी यहां पर चाय पानी व पराठे वह पकौड़ी की व्यवस्था थी। सोनप्रयाग से हम सुबह खाली पेट ही चले थे रास्ते में भी दो बॉटल कोल्ड ड्रिंक की व बिस्कुट के पैकेड से काम चल रहा था। यहां पर मैंने दो पराठे खाए परंतु चाय नहीं पी, कारण पाउडर के दूध से बनी चाय अच्छी नहीं लगती है। यहां से एक किलमीटर चलने के बाद सर्दी बहुत जायदा लगने लगी थी, भाले भाई ने अपनी जैकेट निकाल कर पहन ली, मेरे पास कोई गर्म कपड़ा नहीं था,मैंने सिर व कानों पर अंगोछा रूपी तौलिया बांधा व एक चादर ओढ़ ली। अब यहां से हल्की-हल्की बारिश होने लगी। यहां पर रहने वाले एनडीआरएफ के जवानों ने बताया कि बारिश तो यहां लगभग रोज ही होती है। हमारे पास कोई बरसाती भी नहीं थी। एक रेन शेल्टर में कुछ देर खड़े रहे। अब तेज वसिस के साथ तेज हवा भी चलने लगी। लगातार सर्दी बढ़ती जा रही थी। जो असहनीय हो रही थी।
थोड़ी देर बाद कुछ बारिश धीमी हुई, हम यहां से हल्की हल्की बारिस में ही धीरे धीरे चलते हुए लिंचोली पहुंचे गए। लिंचोली में एनडीआरएफ की बतालियान रहती है यही पर हेलीपैड भी बना हुआ है। यहां पर एनडीआरएफ के जवान हर यात्री की पर्ची चेक करते है। पर्ची चेक करने के बाद जैसे जैसे ऊपर की चढ़ते जाते थे, वैसे वैसे यहां पर कड़ाके की सर्दी बढ़ती का रही थी। अब सर्दी सहन नहीं हो पा रही थी। इस सर्दी की वजह से मेरा शरीर तपने लगा व मुझे बुखार हो गया। अब मुझे चलने में काफी परेशानी होने लगी। एक एक कदम मुश्किल होता जा रहा था।इस समय ग्लेशियर पर चलना पड़ रहा था। जैसे तैसे मै ऊंचे ऊंचे ग्लेसियर को पार करते हुए, सबसे ऊपर की ऊंचाई केदार खंड पर पहुंच गए। इस रास्ते की ये सबसे ऊंचाई वाली जगह है। यहां से एक तरफ दूर केदार नाथ का मंदिर साफ दिखाई देता था। तो दूसरी तरफ लिंचॉली में एनडीआरएफ के टेंट दिखाई देते थे। अब यहां से केदार नाथ जी की उतराई शुरू हो जाती है।
अब बुखार व तेज बर्फीली हवाओं की वजह से यह शेर आदमी अब गीदड़ बन चुका था। केदरखंड की इस जगह पर यात्रियों के बैठने व चाय की व्यवस्था प्रशासन द्वारा फ्री की जा रही थी। अब यहां से आगे बढ़ने की मेरी हिम्मत जवाब दे गई थी। मेरे से अब बिल्कुल भी एक कदम नहीं चला जा रहा था। हालांकि यहां से उतराई का ही रास्ता था। मुझे उतरते हुए चलने में कोई दिक्कत भी नहीं होती। लेकिन मुझे ठंड लगने व बुखार होने के कारण में यहां पर एक शेल्टर में बैठ गया। मैंने अपने बेग से combiflame की टैबलेट निकाली ओर पानी के साथ निगल ली। भाले भाई ने बहुत समझाया कि गर्म गर्म चाय पी लो , लेकिन मैंने चाय नहीं पी। ओर चादर ओड कर बिहाली बहू की तरह बैठ गया। सच में यहां बारिश व तेज बर्फीली हवा में भीगने से मेरी तबियत बिगड़ गई थी। भाले भाई मेरी हिम्मत बनवाने लगे, लेकिन मैंने भाले भाई से कहा कि मैंने अभी गोली खाई है। थोड़ी देर बाद चलेंगे, यहां मैंने लगभग एक डेढ़ घंटे आराम किया। आराम करने के बाद दवाई ने अपना काम शुरू कर दिया था। थोड़ी देर बाद शरीर में एक बार फिर कुछ जान आयी।
अब मै केदार नाथ जी की ओर चल दिया, यहां से केदारनाथ स्थिति हेलीपैड की दूरी शायद एक किमी ही होगी। यहां से मै भागा भागा प्रशासन द्वारा यात्रियों के लिए हेलीपैड के पास ही रुकने के लिये टेंटो के ऑफिस में पहुंचा। लेकिन उससे पहले हमने पर्ची काउंटर पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी थी जो बहुत जरूरी कार्य था। यहां पर हमने एक टेंट में दो बेड बुक किए। इन बेडो का चार्ज प्रशासन ने ₹ 100 प्रति बेड रखा था। यह टेंट हाउस वॉटर प्रुफ, व अंदर से बहुत ही अच्छे बने हुए थे। उपर नीचे वाले 5x 2 =10 बेड थे। उन पर नया कोरफॉम का गद्दा व साफ़ सुथरी सफेद बेडशीट बिछी हुई थी व साथ में स्लीपिंग बेड था, यहां पर आने के बाद मैं सीधा स्लीपिंग बैग में घुसा व आधी गोली और खाई। ठंड की वजह से दांत किड़किडा रहे थे। यहां पर मैंने दो घंटे आराम किया।
आराम करने के बाद, शेर फिर एक बार गरजने को तेयार हो गया था। अब शरीर में फिर पहले वाली ताकत आ गई थी। अब शाम के 5:30 बजे रहे थे। हम बिस्तर से बाहर निकल कर सर्द हवाओं के बीच मंदिर के आसपास घूमने निकले। मंदिर के आसपास बहुत सारे भवन टूटे फूटे पड़े थे। यहां पर इन भवनों को देख कर बड़ा दुख हुआ। मंदिर तक का रास्ता भी कच्चा टूटा फूटा ही था। यहां प्रसाद बेचने वालो की भी दो तीन ही दुकानें थी। यहां से मंदिर की दूरी लगभग आधा किमी ही होगी। घूम फिर कर हम फिर वापिस अपने टेंट में आ गए थे और बिस्तर पर आ कर लेट गए। थोड़ी देर बाद भाले भाई मेरे से बोले कटारिया जी खाना खाने चलते हैं। मैंने उससे कहा भाई मैं खाना नहीं खाऊंगा आप खाना खा लो, मेरे लिए बस एक बिस्कुट का पैकेट ले आना।
रात को 9 बजे मै और भाले भाई टेंट से बाहर लघुशंका के लिए आए। जैसे ही हम बाहर आए तो बाहर पहाड़ों का नजारा तो कुछ और ही दिखाई दे रहा था। जब हम टेंट में थे तो बर्फबारी हो गई थी जिसका हमें पता ही नहीं चला। जमीन पर काफी बर्फ पड़ी हुई थी। जिस का हमें बिल्कुल भी अहसास नहीं था। चांदनी रात में मंदिर, व बर्फ से ढके सफेद पहाड़ो पर चांद की चमकीली रोशनी पड़ने के कारण यहां का नज़ारा कुछ और ही दिखाई दे रहा था। जो हमने अपने जीवन में पहली बार ही देखा था। बर्फ से ढके पहाड़ चमकदार चांदी की तरह चमक रहे थे। सारी बाते छोड़ो जो मैंने अपनी आंखो से देखा वो नज़ारा स्वर्ग में विचरण करने जैसा था। ,अपनी आंखो से जो मैंने बर्फ से ढके पहाड़ो का जो नज़ारा देखा, ये नज़ारा में मरते दम तक भी नहीं भूल पाऊगा। यहां का नजारा अकल्पनीय व अद्भुत था। यही तो बाबा केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग जी की महिमा थी, जो हर किसी के नसीब में नहीं होती, बोलो बाबा केदार नाथ जी की जय।
लघु शंका के बाद हम पीने के लिए गर्म पानी के लिए हेलीपैड की ओर गए, वहां पर एक बहुत बड़ा खाली कमरा था। उस कमरे में कुछ लोग लकड़ी जला कर अपने हाथ पैर व शरीर को सेक रहे थे। मै भी वहा उनके बीच पहुंच गया। यहां आने पर पता चला कि ये सब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लोग थे, जो अलग अलग चैनल से कवरेज करने के लिए आए यहां पर आए थे। उनसे मिल कर हमें बड़ी खुशी हुई। ,ये बच्चे भी वारिस में भीगे हुए थे इनमें दो लड़की की तबीयत भी कुछ ढीली थी। इन्हें भी सर्दी लग गई थी। इनको भी बुखार की शिकायत थी। इन दोनों लड़कियों को मैंने अपनी जेब से निकाल कर combiflame की टैबलेट दी। जिन्हे खाकर इन्हे काफी राहत महसूस हुई।
यहां पर अब आग के चारो ओर बेठे सभी लोग आपस में हसी मज़ाक व दिन में घटे घटनाक्रम पर अपनी अपनी चर्चा कर रहे थे। हर आदमी अपनी आपबीती सुना रहा था। फिर यहां गाने , किस्से, कहानी का दौर शुरू हो गया था। यहां पर अब हर सदस्य अपना हुनर दिखा रहा था। गीत चुटकले आदि का कॉम्पिटिशन चल रहा था, हम भी 48 वर्ष के अनुभवी उन पत्रकारों के साथ 35 वर्ष के हो गए थे। भाईयो हम भी बाथरूम सिंगर है। ओर यहां पर मै अकेला ही सब पर भारी पड़ गया।
मेरे पास गाने के अलावा यात्रा से संबंधित किस्से कहानियों की भरमार थी। सभी साथियों का अलाव के आगे अच्छा समय व्यतीत हो रहा था और रात का एक बजे गया था लेकिन हमें पता ही नहीं चला। सुबह मंदिर में भगवान केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन भी करने थे, इसलिए सभी साथी अपने अपने टेंट स्थित अपने बिस्तर में पर चले गए।
मै सुबह पाच बजे उठ कर, नित्य कर्म से निवृत्त हो कर सोचने लगा कि इतनी सर्दी में कैसे व कहां नहाना होगा। क्योंकि मैं बिना स्नान के नहीं रुक सकता था। मैं जब तक स्नान नहीं कर लेता, मुझे चैन नहीं पड़ता है। मुझे वहीं पर एक जगह खुले आसमान के नीचे दो पानी की टोटी चलती हुई दिखाई दी। इन तोटियो के नीचे हलवाई वाले सिलवर के बड़े बड़े भिगोने रखे थे। जो पूरी तरह भरे हुए थे और उन भिगोने से पानी बह रहा था। मुझे वहां कोई मग बगेरा दिखाई नहीं दिया। काफी लोग वहां खड़े यही सोच रहे थे कि गर्म पानी की कोई व्यवस्था हो जाए।
लेकिन यहां पर शेर ने फिर एक बार अंगड़ाई ली। मैंने बहुत जल्दी से अपने कपड़े उतारे और यहां पर मुझे हलवाई वाली एक बड़ी परात दिखाई दी, मैंने उस परात को उठाई ओर भिगोने में डूबो कर पानी भर भर के अपने शरीर पर बार बार डालना शुरू कर दिया। पहली परात पानी गिरते ही शरीर ने बिजली का करंट सा लगा। मैंने जल्दी जल्दी जल्दी आठ दस परात पानी अपने शरीर पर डाला। शरीर में से अब गरम गरम भाप निकल रही थी। इस घटना के बाद अब शेर, सबा शेर बन गया था। वहा पर सब लोग मेरी तारीफ कर रहे थे। कुछ और लोगों ने मुझे स्नान करता देख कर अपनी हिम्मत बनाई। मैने अब जल्दी से अपने कपड़े उठाए और अपने टेंट कि और तेज़ी से भागा, और सीधा अपने टेंट स्थित अपने पलंग पर पहुंचा, मैंने जल्दी जल्दी कपडे पहने, ठंड लगने के कारण मेरे दांत किड़कीड़ा रहे थे। लेकिन मेरा तो काम हो चुका था मुझे स्नान करते देख भाले भाई बोले में भी नहाने जाता हूं। लेकिन भालें भाई की हिम्मत जवाब दे गई वो मुंह हाथ धोकर वापिस आ गए, और मुझसे बोले, भाई हिम्मत नहीं जुटा पाया। भाले भाई मुझ से बोले कटारिया जी मेरे बदले का एक बार स्नान और कर आओ। मैंने भाले भाई से कहा कोई बात नहीं, भोले बाबा को ऐसा ही मंजूर है।
स्नान करने के बाद हम दोनों तेयार होकर हम सीधे मंदिर पर पहुंचे। प्रसाद की दुकान से प्रसाद खरीदा। मंदिर पर अभी तक दो चार ही श्रद्धालु थे। धीरे धीरे श्रद्धालुओं की तादात बढ़ने लगी,। यहां भी हर मंदिर की तरह बहुत से लोग बिना लाइन के आगे घुसने लगे, कुछ देर बाद मंदिर के कपाट खुले।
सबसे पहले मंदिर के बाहर नंदी बैल के दर्शन हुए। मंदिर में प्रवेश करते ही मंदिर की दीवारों पर पांडवों की दीवार में ही मूर्ति बनी हुई है जो अति प्राचीन है।मंदिर के पहले परकोटे को पार करते हुए गर्भ गुफा में पहुंचे। जहां पर केदारनाथ की पिंडी भेसे के पिछले हिस्से के आकार की है जो बहुत बड़ी है जिसकी लंबाई चौड़ाई एक से डेढ़ मीटर के करीब होगी। मंदिर में मै एक किनारे पर बहुत देर बैठ कर मैंने केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग जी की पूजा अर्चना की। वहीं पर एक पुरोहित में मेरी पूजा अर्चना कराई क्योंकि मैं बाहर से अपने साथ कोई पुरोहित नहीं लेकर गया था।
पूजा अर्चना करने के बाद मंदिर से बाहर निकलकर मंदिर की परिक्रमा की। मंदिर के ठीक पीछे एक बहुत बड़ी पत्थर प्रलय में बहता हुआ यहां आ गया था जिसकी वजह से इस मंदिर को कोई नुकसान नहीं पहुंचा था। अब इस पत्थर को भीम शिला कह कर पूजा अर्चना की जाती है। मंदिर के दर्शन करने के बाद हमने मंदाकिनी नदी से एक बॉटल में जल भर कर प्रसाद वाले की दुकान से अपने सामान का थैला वापस सोनप्रयाग की ओर चल दिए।
रात को आराम से सोकर, सुबह के सर्द मौसम में बर्फीले पानी से स्नान कर के शरीर में नई चेतना व ताकत आ गई थी। बुखार का अब कोई पता नहीं था कि वह कहां चला गया था। अब वापिसी में यहां से हमारे कदम अपने आप ही आगे की ओर बढते जा रहे थे। जिस काम के लिए हम घर से निकले थे वह कार्य था भगवान केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन, वह हमारे बहुत अच्छी प्रकार हो चुके थे।
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यहां से हम ऊपर की ओर चढ़कर प्रशासन द्वारा नियंत्रित सूमो गाड़ी में बैठ कर सोनप्रयाग वापिस पहुंचे, ठीक दोपहर के 2:15 हो रहे थे। हमने अपनी मोटसाइकिल जो उस समय भगवान भरोसे ही खुले में ही पर्ची काउंटर के आगे छोड़ गए थे, वहीं हेलमेट के साथ सकुशल मिली। उस समय सोनप्रयाग में कोई भी पैड पार्किंग नहीं बनी थी। सब अपनी गाड़ी खुले में ही छोड़कर भगवान केदारनाथ की यात्रा पर जाते थे।
सोनप्रयाग में हमने एक रेस्टोरेंट पर जल्दी-जल्दी हल्का खाना खाया। रेस्टोरेंट वाले ने हम से कहा की अब हरिद्वार जाने का समय नहीं है दोपहर का ढाई बज रहा है, मैंने होटल वाले से कहा, भाई मै 9 बजे तक हर हालत में ऋषिकेश पहुंच जाऊंगा। फिर एक बार बाइक मैंने संभाली और हर हर महादेव के जयकारों के साथ सकुशल ऋषिकेश की और चल दिए।
दोस्तो अब आप शायद विश्वास नहीं करोगे, सोनप्रयाग से नॉन स्टॉप बाइक चला कर मै रात 8:55 पर ऋषिकेश पहुंच गया था। रास्ते में कहीं भी एक मिनट के लिए भी मैंने बाइक नहीं रोकी थी। व हरिद्वार पहुंच कर हमने शिव धाम ट्रस्ट में रात्रि विश्राम किया।
दोस्तो कॉमेंट कर बताए कि आपको यात्रा वृतांत कैसा लगा प्रतीक्षा में
























































ग़जब की रोमांचक यात्रा।फिर भी ठंढ इतना रिस्क नहीं लेना चाहिए।मैदानी भाग केलोगों को ज्यादा ठंढ में परेशानी बढ़ सकती है।बाबा की कृपा से यात्रा शकुशल सम्पन्न हुई।
ReplyDeleteआशुतोष शर्मा जी नमस्कार,
Deleteसर मैं अपने बालक काल से ही साहसी रोमांचकारी गतिविधियों में ही रहा हूं
और आज भी यही हिम्मतवर हौसला कायम है मैं एक स्पोर्ट्समैन था जिसने कभी हिम्मत नहीं हारी
बाकी आपकी साला बहुत अच्छी है धन्यवाद 🙏
कटारिया जी आपकी यह यात्रा बहुत ही गज़ब रही। बीच बीच मे हंसी मजाक के किस्से भी खूब रहे। आपने कॉम्बिफ्लेम का भी पूरा प्रचार किया। मुझे यह यात्रा बहुत पसंद आई और केदारनाथ की अपनी यात्रा के कुछ पल भी याद आये। आपका बहुत धन्यवाद।
ReplyDeleteSachin3304.blogspot.com
बहुत ही साहसिक यात्रा हुईं आपकी भाई साहब। बहुत ही शानदार और जानदार,, जय़ बाबा केदार।। भाई साहब सोनप्रयाग के वृतांत में अलकनंदा की जगह मंदाकिनी नदी कीजिए।।🙏🙏
ReplyDeleteJai ho baba kedar.
ReplyDeleteबहुत ही सुन्दर और सटीक वर्णन राकेश जी, पढ़ते हुए ऐसे अनुभूति हो रही थी मानो एक एक स्थल पर स्वयं उपस्थित हो☺️��
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद घर बैठे बैठे ही आपने श्री केदानाथ भगवान की यात्रा करादी�������� पर अब उत्सुकता और बढ़ी कि हमें कब बुलावा आएगा महाराज का?��������
☺️☺️
अदभुत वर्णन ऐसा लग रहा है मानो हम सचमुच की यात्रा कर रहे हैं। धन्यवाद कटारिया जी आपने बैठे बैठे बाबा के दर्शन करा दिए
ReplyDeleteकटारिया जी! मुझे आजतक बाबा केदार के दर्शनों का सौभाग्य नहीं मिला है। ऐसे में आपकी ये यात्रा मेरे लिए रहस्य, रोमांच से भरपूर फ़िल्म सरीखी सिद्ध हुई जिसमें शेर की दहाड़ से लेकर गीदड़ की भभकी तक सब कुछ था!
ReplyDeleteजब आप हरिद्वार - ऋषिकेश तक पहुंच ही गए थे तो यह तो तय हो ही चुका था कि अब केदारनाथ यात्रा पक्की है! फिर भी आपने अपने लिए स्वेटर आदि गर्म पकड़े नहीं खरीदे, ये कतई भी अच्छा नहीं लगा! पर खैर, आपकी हिम्मत की तो दाद देनी पड़ेगी। बाबा केदार की जय!